ढलता सूरज...

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ढलता सूरज...

ढलता सूरज..... अक्सर ढलता सूरज जीवन के आँगन में कई यादें छोड़ जाता है और इन यादों में किसी का इंतज़ार आज भी याद है मुझे जब भी होता था मैं साथ तुम्हारे तब खोजती थी तुम कुछ पल ऐसा जो तुम्हारे लिए हो जिसमें छिपी हो कोई ख़ुशी

जाने क्यों..।।।

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जाने क्यों..।।।

ना जाने क्यों.... ना जाने क्यों... आज अपने आप से हीं बातें करने का ख्याल आ गया और ख्याल आया कि कुछ लिखूँ, लिखने के लिए कलम उठाया तो जाने क्यों गुजरे हुए लम्हों की यादें जेहन में उभरने लगीं.। कई हँसते हुए मुकाम भी शामिल ह

उसके बिना जी कर देखा....

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11 -Oct-2017 Thakur Gourav Singh Lonely Poems 3 Comments  92 Views
उसके बिना जी कर देखा....

उसके बिना जी कर देखा तो मैंने पाया , कि जैसे रातों की एक लम्बी गहरी सी खाई जहाँ सुकून और चैन खो गए , बस आँखों में एक काली गहरी सी स्याही। तन्हाईयों में जीने का एक हाथ जो थामा था उसने , उस हाथ की ही रेखाओं में , तकदीर छिन

Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue?

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03 -Oct-2017 victorious Lonely Poems 0 Comments  44 Views
Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue?

Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue? sisakte hue apna dard kisi ko kehte hue sitaro ki mehfil mein bhi khud ko tanha hote hue Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue? din dhal jaane par raat ke aa jane par phir udaasi mein khud ko ghham mein dubote hue Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue? andheri raato mein kisi ki yado mein bechain hokar apni palkein bhigote hue Tum ne dekha hai kabhi chand ko rote hue? تم نے دیکھا ہے کبھی چاند کو روتے ہوئے؟ سسکتے ہوئے اپنا درد کسی سے کہتے ہو

बिखर गयीं हूँ मैं

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18 -Sep-2017 Jyoti Lonely Poems 0 Comments  89 Views
बिखर गयीं हूँ मैं

बिखर गई हूँ मैं मुझको न समेटो कोई फिज़ा में फैली खुशबू हूँ जैसे कोई सहम जाती हूँ यही सोच कर मेरे चेहरे पर तेरा अक्स न देखे कोई तन्हाइयों में गुजारती हूँ लम्हे कई राहें जो गुजरी हैं तेरे हुजरे की तरफ से झुका के पलकों

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