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Bhool Gaya Tha Main Khud Ko

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10 -Jun-2013 AMAR PRAKASH Love Poem 0 Comments  1,808 Views
AMAR PRAKASH

देखा था, जब मेरे,
इन दो नयनों ने तुमको।
अपलक निहारा, कुछ पल फिर,
भूल गया था, मैं खुद को।

फिर सोचा कहीं,
ये स्वप्न न हो।
टूटे न जाए कहीं,
मन खिन्न न हो।

अवचेतन से, चेतन होकर,
पाया कि, एक हकीकत ही, हो तुम।
खुदा की तराशी हुयी, कोई,
खाती-पीती, एक मूरत हो तुम।

अभिन्न अंग हूँ, शायद तेरा,
ये एहसास हुआ था, मुझको।
वह पल कुछ ऐसे बीता था,
जैसे मधुमास बीता हो, गत पल को।

मन में सोचा, फिर-फिर सोचा,
कि, क्या कहूँ , कैसे कहूँ ?
आखिर बयाँ वो, कर ही डाली,
दांस्ताए दिल, हू - ब- हू।

शर्म से यूँ फिर , सर झुकाकर,
तुमने जो काटा होंठ को।
खूबसूरत एक कोशिश,
छिपने खुद, तिनके की ओट को।

क्या बताऊँ, मासाअल्लाह,
ओ हो हो, बस, ओ हो हो।



Dedicated to
My wife

Dedication Summary
She is the one, for whom this poem is all about..

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