Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

Maaa

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06 -Feb-2021 p.m. Parents Day Poem 0 Comments  338 Views
p.m.

यूँ ही वो महान नहीं बना
बरसो उसने भी पीड़ा सही
दलन हुआ, वलन पड़ा
तब हुआ हिमालय खड़ा।


सबको मोहता वो पुष्प
यूँ ही नहीं जमुहाता उठ पड़ा
भले ठाट बाट मे बना ठना
आज रंग रूप का प्रसंग
गाता घूमता हो
पर उसका संदर्भ
यूँ ही प्रसफुटित नहीं हो उठा

पिता नभ रात्रि होते ही सहजता से ही नहीं
छाती से लगा लेता बाल तारामंडल को
भोर होते ही उन्हे लाल ताल
शिक्षक सूरज को सौंपना
सहज है क्या पिता को?


कुछ भी नूतन ,कुछ विशाल
कुछ भी अद्वितीय
सहज नहीं है जब,
तो तुम मुझे इतनी सुगम कैसे?


तुम्हारे लिये भी तो सूत्र वही थे,
वही जटिल समीकरण,
वही दशमलव से
मुझे अपने अंदर महीनों पालते
कठिन मान

मेरी भूलो को बड़ी नरमाहट से भूलना
और अंत मे मिटा ही देना
क्या हमेसा सहज रहा तुमको?


ढोलक मंजीरो सी बज बज के ,
जब दुनिया मेरा विरोध करती,
तब भी मधु ही रही तुम,
तुमने अपने स्वर पर ही चलाया
मेरे लिए,मधुर संगीत।

कतई सहज नहीं था
पर तुम सम रही
तुम्हारी लाडो चंदानिया मैं
फसल सी तुमसे कटी जब
कितना कलेजा चिरा तुम्हारा
सो आज भी
झुलसी- सूखी टहनी सी
नजर आती हो तुम।

सहेज तो लेती हो तुम
अपनी उलझने उधेड़ कर
बुन लेती हो हर बार खुद को


कितनी दुकाने जाती होगी
कहा से ख़रीद लाती हो हर बार
उतनी ही दृढता, उतनी ही परिपक्वता


जब तुमसे बनी ,नयी, रंगी- पुती
फ़र्श हूँ मैं,तो सारे दुरमुठ
तुम ही कैसे सह लेती हो।


तुम तो नहीं पायी सहजता से कुछ
मुझे सहज ही कैसे मिल गई तुम?


सुनो तुम माँ हो, देवी नहीं हो कोई
क्यू नरम मखमली स्नेह के
सेज ही बनाती चली जाती हो??

तुम ही क्यूँ इतनी सस्ती हो
जो मेरी जैसी इकन्नी दुकन्नी पर
हजार बन लुट जाती हो?

सच बताओ
असहज अद्वितीय होकर भी
कैसे इतनी सहज माँ हो जाती हो??



Dedicated to
Mum

Dedication Summary
I lv my mom

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