मैं बेटी हूं....

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11 -Aug-2017 Aakash Parmar Daughter Poems 0 Comments  144 Views
Aakash Parmar

गर शब्द हूं मैं,
तो कविता मुझे बन जाने दो जरा,
वृतांत हूं मैं कोई अगर,
तो इतिहास मुझे बन जाने दो जरा,
शिखर हूं मैं कोई,
आकाश को छू लेने दो जरा,
नन्ही कली सी नाजुक मैं,
मुझे फूल कोई बन जाने दो जरा,
मैं बेटी हूं,
मुझे कोख में पलने दो जरा।

देख भी ना पायी दुनिया को मैं,
मेरे अंश को खत्म कर दिया तुमने,
क्या गलती थी मेरी, जो
इस संसार मे ना आने दिया तुमने,
गर पाप है एक बेटी होना,
तो गर्भ अंश मिटाना कहाँ पुण्य है,
क्यूं जकड़ा हुआ है मन अभी भी,
क्यूं मानसिकता अभी भी शून्य है,
गतिशील हूँ, निरंतरता है मुझमें,
जैसे कल-कल बहती कोई धरा,
मैं बेटी हूं,
मुझे कोख में पलने तो दो जरा।

अब सवाल है एक बाप से,
क्या जीने का हक़ भी नही मांग सकती आप से,
बेटी हूं तो क्या हुआ,
मुझे भी हक़ है जीने का,
साथ में आपके खेलने का,
और मेरी माँ का दूध पीने का,
पापा मुझे पढ़ाओ तो जरा,
मुझ पर अपना अभिमान जताओ तो जरा,
मैं बनु तेरी बिटिया हर जन्म में सदा,
मेरी किलकारियां से रहे घर हरा-भरा,
मैं बेटी हूं,
मुझे कोख में पलने तो दो जरा।

- आकाश परमार



Dedicated to
सभी बेटियो को... उनके हक को


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