Latest poems on teachers day, sikshak diwas kavita

मैं नहीं डरती

0
12 -Mar-2018 Akshunya Woman Poems 0 Comments  182 Views
Akshunya

मैं नहीं डरती,
हाँ मैं नहीं डरती,
जब कर देते हो तुम मेरे सपनों को चूर,
जब पड़ जाती है मेरे अस्तित्व पर धूल,
जब तुम्हारे ताने लगते हैं मुझे जैसे शूल,
मैं नहीं डरती।

मैं नहीं डरती,
जब तुम राह चलते,
छीन लेते हो मेरे तन से आंचल,
जब कसते हो गन्दी फब्तियां,
देख मेरा वक्ष स्थल,
जब रोंद देते हो मेरे तन को, बस उस एक ही पल,
मैं नहीं डरती।

मैं नहीं डरती,
जब तुम कर देते हो मेरी हत्या भ्रूण में ही,
या फिर डुबा देते हो मुझे मेरे पैदा होते ही,
न हुआ कुछ और तो फैंक देते हो किसी कूड़े के ढेर पर,
मैं तब भी नहीं डरती।

मैं नहीं डरती,
जब तुम किसी बदले की मंशा से,
कर देते हो मुझे घायल,
जब तुम झुलसा देते हो मेरे तन को,
डाल कर तेजाब,
बिना सोचे, मुझे होने वाले असहनीय दर्द से,
मैं नहीं डरती।

मैं नहीं डरती,
क्योंकि जो सपने तुमने तोड़े,
उनको फिर देखने का साहस है मुझे,
क्योंकि जब रौंदा तुमने मेरे तन को,
आत्मा दे गई जीने का नया साहस मुझे,
क्योंकि जब फेंक दिया था कूड़े में,
वो गंदगी ही बना गई उज्ज्वल मुझे,
क्योंकि जब फेंका था तेजाब तुमने,
झुलसा बैठे तुम अपने जमीर को, पर झुलसा न सके मुझे।
यह सब जो कृत्य तुम्हारे थे,
दिला गए मुझ में एक नई चेतना,
जो मुझे नहीं देती डरने,
इसलिए मैं नहीं डरती।।



 Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017