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मैं पुरुष रूप में वरगद हूँ

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24 -Feb-2021 bharat Lonely Poems 0 Comments  249 Views
bharat

मैं पुरुष रूप में वरगद हूँ

भीतर से हूं निरा खोखला, बाहर दिखता गदगद हूँ...
मिथ्या कहते है सबल श्रेष्ठ, मैं पुरुष रूप में वरगद हूँ...
मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ...

सदियों से नारी का शोषक, अंतर में केवल काम भरा..
दंभी, छलिया, कभी नेह शून्य जग ने जो चाहा नाम धरा..
मैं रहा ताकता अरसे से मुझको भी तो कोई जाने...
अतिशय कठोर आवरण के उर अंतर में कितने छाले..

सम्मुख जो दिखता शुष्क शूल मैं नर्म सुहानी कौपल हूँ...
मिथ्या कहते है सबल श्रेष्ठ, मैं पुरुष रूप में वरगद हूँ...
मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ...

जैसे वरगद तरु अति विशाल, हरि हर जैसे पूजा जाता...
अति क्लांत श्रमिक या थकित पथिक, सुस्ताता आश्रय को पाता...
पर आँगन या गृह उपवन में बड़ होता तो स्वीकार नहीं…
मुझसे भी सब रिश्ते पोषित पर मुझे स्नेह प्रतिकार नहीं...

जिनके हित सब कुछ अर्पित, उनकी नज़रों में कर्कश हूँ....
मिथ्या कहते है सबल श्रेष्ठ, मैं पुरुष रूप में वरगद हूँ...
मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ, मैं वरगद हूँ...



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