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मैंने प्रवाह करनी छोड़ दी है

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11 -Oct-2021 Harpreet Ambalvee Social Poems 0 Comments  37 Views
मैंने प्रवाह करनी छोड़ दी है

मैंने प्रवाह करनी छोड़ दी है,
सीये थे होंठ जो मेरे शर्म से,
रिश्ते को बचाने के लिए,
रोते हुए दिल की चीख़ो से,
वो शर्म की गांठे खोल दी है,
मैंने परवाह करनी छोड़ दी है,

घुटता रहा सहमता रहा,
जिनके लिए सालों साल,
कहीं कोई जवाब ना दे दूं ऐसा,
के हो न जाए कोइ बवाल,
मगर अब उन बवालो के तूफानों की
राहे मैने मोड़ दी है,
मैंने परवाह करनी छोड़ दी है,

क्यों करूं सितम खुद पर,
जब दूसरों पर उसका कोई असर नहीं,
क्यों समझने दू दूसरों को,
कि उनके बगैर मेरा बसर नहीं,
उनको गलतफहमीयो मे रखने की आदत,
अब छोड़ दी है,
मैंने परवाह करनी छोड़ दी है,

फर्क नहीं जिन पर मेरे आंसुओं का कोई,
ना जाने मेरी आंखें बिना आंसुओं के भी कितना रोई,
अब इन सूखी सहमी आँखों को,
बेवजह बरसाने की दास्तान तोड़ दी है,
मैंने परवाह करनी छोड़ दी है,

हमेशा खुश रहना,उसकी रज़ा मे रहना ही, है ज़िंदगी,
किसी को कोई ना खुश रख सका है,
ना कभी कर सकेगा, अम्बालवी,
रिश्तो की दौड़ मे खुद को अब,
अव्वल बनाए रखने की होड़ छोड़ दी है,
मैंने परवाह करनी छोड़ दी है।

मैंने प्रवाह करनी छोड़ दी है


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