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मन की छटपटाहट

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12 -Jan-2022 Parmanand kumar Dream Poems 0 Comments  214 Views
Parmanand kumar

मन की छटपटाहट
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आगे बढ़ने की चाह में
कई मील पीछे हो चला हूँ

जिन्दगी में देखे थे जो ख़्वाब
बुलंदी पर जाने को
हक़ीकत में एक एक कर टूटते चला जा रहा है..
मुझ पर कुटिल व्यंग्य मुस्कान करते हुए...

आज सहने पड़ते हैं ताने
उन्हीं के
जिनको कोंपल की भाँति
संभाले चल रहा था।

पर हमें ख़ुशी इस बात पर थी
कि अनुजों को संभाले चल रहा हूँ,
पिता के आदेशानुसार पथ पर जिया जा रहा हूँ..

पर अब गम है कि सबने कहा---
आपने कुछ भी नहीं किया
हम सबको ...
बचपन से जवानी तक लाने में.. कोई किरदार नहीं है आपकी!

और तो और ,माँ की हृदय भी
कोमलता से कोसों दूर
निष्ठुरता से भी नहीं कही
मेरे सद्कर्मों की कहानी


जो साक्षी थी मेरे गति की
वो शेष बची, मेरी माँ है
और वो भी मौन -विराम है!
मेरे ग़म और उदासी का
सबसे बड़ा ये कारण है!

भले ही हृदय के टुकड़े हुए
रक़्तपात भी सहते रहे मन ,
मन छटपटाता रहा,
जी मचलता रहा
मंजिल की चाह में,
मन लगाता रहा
किंतु और परंतु में
मन भटकता रहा
पीढ़ियों को आगे देखने की चाहत में
खुद को मिलों पीछे करते रहा

संघर्ष ही जीवन है
ये पाठ पढ़ते चला

असफलता का स्वाद
इतनी कड़वी होती है
कि सफलता के मिलन से
ही ज्ञात होता है!

छोटी सफलता मिलने की
ख़ुशी,
बड़ी सफलता न मिलने के गम में ही हो जाती है दफ़न!

ऐसी है छटपटाहट मेरी
दुःखी मन से गढ़ता हूँ
फिर भी अपना जीवन!

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