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मन किया करते गए

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09 -Jun-2019 Anand kumar (Manish) Travel Poems 0 Comments  103 Views
Anand kumar (Manish)

मैं ठहरा मनमौजी राही
मंजिल तय किए बिना निकल पड़े
अपने पराए का दुख-दर्द भुला के
अनजान राह पर चल पड़े


न जाने कहाँ पहुंचेंगे कब पहुंचेंगे
बिना कुछ सोचे चलते गए
जिधर जाने का सोचा
उधर मेरे कदम मुड़ते गए


मंजिल का तो कोई ठिकाना नहीं
मंजिल आएगी अब आएगी
यह सोचकर आगे चलते रहे
आशा निराशा का बोझ लिए
बस आगे बढ़ते रहे


भूखे प्यासे कड़कती धूप में बस
अनजान राह पर चलते रहे
प्यास बुझाने के लिए दो बूंद
पानी के लिए तरसते रहे


प्रश्नों की थैली लेकर
दर-दर हम भटकते रहे
सबको अपना सोचकर
गैरों पे विश्वास करते रहे


अनजान राह पर चलते-चलते
महीनों गुजरते गए
दर्द दिया अपनों ने
हम परायों को माफ करते गए


खाली थी झोली मेरी
दूसरों को दान करते रहे
प्यास से मार रहा था मैं
दूसरों की प्यास बुझाते रहे


खुद तो प्रभु का स्मरण नहीं करते
दूसरों को स्मरण कराते रहे
खुद पाप करके
दूसरों को पाप करने से रोकते रहे


जितने सपने देखे थे मैंने
वो एक-एक कर टूटते गए
भूख मुझे लगी थी लेकिन
हम गरीबों में खाना बाटते ग‌ए‌


अपनी खोखली मुस्कान लिए
जब मन किया मुस्कुराते गए
झूठी शान के खातिर
पिताजी का जेब खाली करते ग‌ए


अपना जीवन साथी समझकर
गैरों से मन की बात कहते ग‌ए
शादी करनी थी मुझे
डॉक्टर को कुंडलियां दिखाते गए


खुद पागल होकर
दूसरों को पागल कहते गए
छोटी सी सफलता पाकर
खुद को सफल समझते गए


फसल उगाना था हमें
हम बंजर जमीन में बीज बोते रहे
फल खाना था हमें
तोड़ेंगे कैसे यह सोचते रहे


खुद अज्ञानी होकर
शिक्षकों को दोष देते गए
परीक्षा में खूब लिखा
फिर भी फेल होते गए


जो भी मन में आया
बिना कुछ सोचे लिखते गए
स्याही खत्म हुई कलम की
हम कलम बदलते गए


अंधेरी राह पर दीया लिए बिना
बस चलते गए-चलते गए
अपने पराए का दुख-दर्द भुला के
बस चलते गए-चलते गए



©️ आनंद कुमार (मनीष)
पोस्ट संख्या- 13
पता- दुधानी दुमका झारखंड (814151)
कविता लिखने की तिथि- 07/06/2019
संपर्क सूत्र (फोन नंबर)- 6204443751
ईमेल संख्या- anandkumar814151@gmail.com

मन किया करते गए


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