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1- मौलिक विधा की-सौर्य मंडल,सूरज,मिट्टी,जल,वायु प्रकृतियां

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13 -Jun-2021 Ran Bahadur Singh Miscellaneous Poems 0 Comments  287 Views
1-    मौलिक विधा की-सौर्य मंडल,सूरज,मिट्टी,जल,वायु प्रकृतियां

इस संसार की मौलिक धरा पर,
सूरज,जल,वायु मिट्टी तथा सौर्य मल्लिका।
प्रकृति रहती मूल भावों में द्वितक्रम,
नदी व पर्वत आवर्तिक रहे प्रतिक्रम।

जब भी कल्पना सजीवित रहती,
द्रश्य उतर-चढ़ में ब्यापक।
जब कोई खुद को स्यमं देखता,
चिपके बिन मौलिक भावों में रहता।

धरा-आशमां में जितनी होती ममता,
प्यारी म्रदु धारा खुद संचालित करते।
बहुत सी क्रतियां बिना भाव चलकर,
दिन-रात संग में हमेशा बहा करते।

प्रक्रति में आकर मौसम में जाकर,
समय के संग बिना सोंच चला करते।
जिसमें द्रढ-विश्वास हो जितना,
निश्चित भावों में सुनिश्चित बहते।

मौलिक सोंच से भावित क्रत्य कर,
अपनी मौलिक चाह से मन में समाते।
शुरू से बचपन,जवानी, बुढापा रहा,
तभी संसार में मुहब्बत बनकर छाये।

परम शक्ति होती अर्पित किसी पर,
शक्ति धांरणा अद्वैत बन रहती।
समय के संग सभी भाव रहे बहते,
जिसमें विकार भाव बिल्कुल नहीं दिखते।

चाह मोहब्बत की कैसी वेदना,
कर्मो के संग से निपटते सदा रहते।
अपनी चाह चाहा करो सौम्य बन,
निश्चित धारणां लेकर रहे चलते।

हे मेरे !परवर दिगार तुम,
शक्ति-कर्मठता सब मुझे दे दो।
तीक्ष्ण शक्ति को दम से चलाकर,
भाव-भावना सब मुझमें भर दो।

मौलिक स्थिति में मैं रहा जीवित,
इस संसार में मुझको सुंदर कर दो।
भाव-भावना का जितना रहा वर्धन,
निश्छल भाव सभी मुझमें भर दो।

बहुत समय हेतु जीवन शेष है,
कार्यों को समझकर आगे है बढ़ते।
सोंच समझ में छूट गया सब कुछ,
पूर्व से खाली अब ब्याकुल रहते।

किससे किसको प्रेम अभी भी,
यह शरीर भावों का बन्धन।
यदि लगाव से विरत रहे हम,
कार्यों में होगा अति अनुबन्धन।

हे मेरे! निःस्वार्थ शिरोमणि,
मुझमें परम शक्ति को भर दो।
ऐसी धांरणा प्रकृति की होती,
वैसा विश्वास है मुझमें कर दो।



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