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मेरा नवोदय का अनुभव

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17 -Dec-2019 PANKAJ CHOUREY Memories Poems 0 Comments  824 Views
PANKAJ CHOUREY

मेरा नवोदय

मासूम-सा चेहरा, घर की यादें, जरूरत की चीजों से भरा एक बक्सा लेकर नवोदय
विद्यालय में प्रवेश के लिए निकल पड़ते हैं और अपने आँसुओं की कलम से लिख
जाते हैं घर से दूर जाने का दर्द- हम लड़के...!!!

★6वीं में नवोदय विद्यालय एक अलग-सी दुनिया का एहसास कराता है। सबसे
अनजान होते हैं हम। इस साल हर चीज खुद की होती है। खुद की बाल्टी, खुद का
मग और खुद का छाता। हम सभी नए लोग एक दूसरे से उसके घर का पता पूछते हैं
और जानने का प्रयास करते हैं कि कौन कितनी दूर से आया है। ठीक से कपड़े
नहीं धुल पाते हैं। घर को याद करके रोते हैं। अपने सीनियर से छुट्टियों
के बारे में पूछते हैं। खाना नहीं अच्छा लगता है। कद्दू, लौकी, पत्तागोभी
की तरीदार सब्जी से पहली बार रुबरु होते हैं। यहाँ हर दिन एक नई प्रेयर
को झेलना पड़ता है। 'फादर वी थैंक्स द फ़ॉर द नाईट' को 'फादर वी थैंक्स द
फोर्टी नाइन' गाते हैं- हम नवोदय के लड़के..!!!

★7वीं तक आते-आते सभी के निकनेम रखने की परम्परा पूरी हो चुकी होती है।
हर क्लास में बकरी नाम का लड़का जरूर होता है। चम्मच से खाना खाना सीख
चुके होते हैं। लाइब्रेरी में मौजूद कहानियों की सारी किताब पढ़ डालने का
जुनून सवार होता है। शरारतें करना शुरू कर देते हैं। मॉर्निंग प्रेयर में
हारमोनियम कांगो आदि बजाने के मौके मिलने शुरू हो जाते हैं। मेस से रोटी
चुरा के हॉस्टल ले आने की हिम्मत आ चुकी होती है। धीरे-धीरे नवोदय के
परिवेश में ढलना शुरू कर देते हैं- हम नवोदय के लड़के...!!!

★8वीं में हम जूनियर में सीनियर कहलाते हैं। अब खुद में बॉस होने वाली
फीलिंग आने लगती है। खुद की बाल्टी 'सार्वजनिक' होने से लेकर 'विलुप्त'
की श्रेणी में पहुँच चुकी होती है। अपने जूनियर से अपना होमवर्क पूरा
करने को बोलकर कन्फर्म करते हैं कि सीनियर हुए कि नहीं। अपने जूनियर को
नियम व अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। जूनियर पर सीनियरटी दिखाने के जुर्म
में अपने सीनियर से हड़काये भी जाते हैं। खुद को हाउस मास्टर का चेला
समझते हैं। क्लस्टर में जाने की सम्भावना इस वर्ष ज्यादा रहती है। हाँ...
अब थोड़ा-थोड़ा बड़े होने लगते हैं- हम नवोदय के लड़के...!!!

★9वीं में आते ही फिर से दुबक जाते हैं। सीनियर हाउस में सबसे जूनियर हो
जाते हैं। विज्ञान, गणित को अंग्रेजी में पढ़ना पड़ता है। कुछ विषय बाउंस
मारते हैं। कुछ लेटरल इंट्री से आये हुए मित्रों से मुलाकात होती है।
माइग्रेशन में जाना पड़ता है। TGT शिक्षकों से सम्पर्क कट सा जाता है। PGT
शिक्षकों के स्वभाव को बारीकी से समझने का प्रयास करते हैं। कुछ अच्छे
सीनियर भैया मिलते हैं तो कुछ रौब जमाने वाले भी। सीनियर हाउस में आकर
सीनियर लोगों के बीच डरते-डरते किसी तरह एक साल काटते हैं- हम नवोदय के
लड़के...!!!

★10वीं में आने पर थोड़ा घबराहट सी रहती है। पहली बार बोर्ड एग्जाम फेस
करना होता है। सत्र के शुरुआत से ही बोर्ड एग्जाम-बोर्ड एग्जाम का डर बैठ
जाता है। Autumn Break और Winter Break की छुट्टियों में कटौती हो जाती
है। संडे को ली जाने वाली एक्स्ट्रा क्लास पे गुस्सा करते हैं। बोर्ड
एग्जाम में कुछ के मन में टॉप करने की इच्छा होती है तो कुछ बस प्रतिशत
के इर्द गिर्द अपना टारगेट फिक्स करते हैं कि बस इतना आ जाये। बोर्ड
एग्जाम का रिजल्ट आने से पहले ही 11वीं में साइंस, आर्ट , कॉमर्स,
हिन्दी, कम्प्यूटर साइंस में उलझे रहते हैं- हम नवोदय के लड़के...!!!

★11वीं में आते-आते कुछ साथियों का साथ छूट चुका होता है। वो लोग आर्ट,
स्ट्रीम लेकर दूसरे नवोदय चले जाते हैं। अब हम लोग बड़े हो
जाते हैं। अध्यापक भी कहने लगते हैं- बेटा बड़े हो गए हो। मेस में लाइन
लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है। खाना बिना किसी रोक-टोक के हॉस्टल में ले
आते हैं। कोई अध्यापक देख भी लेते हैं तो कुछ नहीं कहते हैं। अध्यापक
लोगों से डाँट मिलनी बन्द हो जाती है। टी०वी० का रिमोट हमारे हाथ में आ
जाता है। शरारतें जोर पकड़ लेती हैं। विद्यालय स्तर की हर एक्टिविटी में
भागीदारी बढ़ जाती है। एक जिम्मेदार होने का एहसास आता है। ये वही समय
होता है जब नवोदय विद्यालय की बाउंड्री फाँद कर बेगानी शादी में मुफ्त की
दावत का मजा लेने जाते हैं- हम नवोदय के लड़के...!!!

★12वीं में पहुँचते ही बोर्ड एग्जाम में अच्छे प्रदर्शन का दबाव पुरानी
बातों को भूलकर सिर्फ पढ़ाई पे ध्यान केंद्रित रखने को मजबूर कर देता है।
इस वर्ष पढ़ाई के नाम पर अन्य सभी कामों से छूट मिलने लगती है। मॉर्निंग
पी०टी० में समय से पहुँचने का दबाव नहीं रहता। मेस में देर से
खाना/नाश्ता लेने पहुँचों तो कैटरीन सर अपनी आँखें लाल-पीली करने की बजाय
बस मुस्कुरा देते हैं। उनकी मुस्कुराहट ये एहसास दिला देती है कि नवोदय
विद्यालय में हम अपने आखिरी समय में हैं।

और फिर वक़्त आता है नवोदय से विदा लेने का। अंतिम दिन सभी शिक्षकों से
मिलते हैं, आशीर्वाद लेते हैं। खुद को अंदर से मजबूत होने का दिखावा करते
हैं, चेहरे पर नकली मुस्कान लाते हैं। जाते-जाते चाहकर भी खुद को स्थिर
नहीं रख पाते हैं और अपने आँसुओं की कलम से लिख आते हैं नवोदय में बिताए
पिछले सात सालों की गाथा और नवोदय से बिछड़ने का दर्द- हम नवोदय के
लड़के...!!!

@Pankaj Chourey Navodayan
Jnv Hoshangabad
2k12 - 2k19

मेरा नवोदय का अनुभव


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