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मेरे पहलवान 'बाबा'

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25 -Jan-2016 Abhishek chaudhary Grandparents Poems 0 Comments  5,998 Views
मेरे पहलवान 'बाबा'

लोगो से हटकर एक परिवार था
जिसमे बसता एक-दूसरे का प्यार था,
मै भाग्य से जन्मा उसी घर मे..
घर मे रहता एक 'पहलवान' था||

हिम्मत जिसके 'लोहे' थे
इरादो एकदम से फौलाद थे,
दिखने मे इतने हट्टे कट्टे
मानो भीम के 'औलाद' थे||

कोई कहता"सिघंम"कोई कहता" दबंग"
कोई कहता"मुंशीजी"कोई कहता"जोखन"||

बाँध 'लगोटा' जब कभी
खडे़ हो जाते 'दंगल' मे,
दो पहलवानो को एक साथ
धूल चटाते थे एक पल मे||

लेकिन कुछ दिन के बाद ही.....

लेकर सन्यास 'कुश्ती' से,बन
गये जा के 'कांजीहौस' के मुंशी,
उनके बिना 'अखाडा' मानो
लगता जैसे एकदम 'शून्य' सी||

परवाह नही किये कभी,चाहे
जवाना कितना भी खिलाफ रहे,
चलते थे हमेशा,उसी राह पर
जो सीधी,सच्ची एंव साफ रहे||

एेसे थे या वैसे थे,लेकिन
बाबा तो हमारे थे वे...
जब भी किसी ने उन्हे,पुकारा
हर दुख दर्द मे सहारे थे वे||


बहुत कुछ मैने जाना उनसे
कुछ के लिए अनजान रह गया,
बहुत कुछ अब जाकर जाना
शायद,कुछ के लिए नादान रह गया||

कुछ मुझे मिल जायेगा
कुझ मुझसे खो जायेगा,
जब नही रहेगे,'प्यारे बाबा'
ये कविता उनका याद दिलाएगा||
ये कविता उनका याद दिलाएगा||

_______ "अभिषेक चौधरी"____
___बेलराई(सं•क•न•„यू•पी•)



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