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Samajh Nahi Aata

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07 -Mar-2015 ashutosh kamra Miscellaneous Poems 0 Comments  693 Views
ashutosh kamra

आसेब हैं कि हमसफ़र समझ नहीं आता ...
अपनी परछाईयों से डर समझ नहीं आता ...
समझ में आ गए दरया पहाड़ शज़रो ग़ुल ...
याख़ुदा आदमी क्यूं कर समझ नहीं आता ...
हम ने नसलों में रिश्वतों के बीज बोए थे ...
किसलिए उग गए पत्थर समझ नहीं आता ...
कितने दरवाज़ों पर लक्ष्मणरेखाएं खींचूंगा ...
इतने रावण खड़े बाहर समझ नहीं आता ...
ज़रे हराम से तामीर महल कर तो लिया ...
इस को कैसे कहोगे घर समझ नहीं आता ...
कुर्सियों की नीलामीे देख कर न जाने क्यूं ...
टूट जाता है दिल अकसर समझ नहीं आता ...
आशुतोष कामरा बावफा



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