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Mujhe Garbh Me Hi Mat Maro

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Mujhe Garbh Me Hi Mat Maro : This hindi poem spread awareness in our society in preventing girl foeticide or kanya bharun hatya.

12 -Nov-2015 Dr. Swati Gupta Social Issues Poems 1 Comments  1,034 Views
Dr. Swati Gupta

"मुझे गर्भ में ही मत मारो, मुझे इस संसार में आने दो माँ।
मै भी तो आपके शरीर का हिस्सा हूँ,
मुझे ऐसे ही न कट जाने दो माँ।
बेटी हूँ तो क्या हुआ अपना नाम बनाऊँगी,
बेटे की तरह मै भी आपका नाम रोशन करके दिखाऊँगी।
मुझे बाहर आने दो, अपना प्यार पाने दो माँ,
यूँ ही अपने अंश को न कट जाने दो माँ।
तेरे आँचल को मै ख़ुशियों से महकाऊँगी,
बेटे की तरह मै भी तेरे दूध का क़र्ज़ चुकाऊँगी माँ।
डॉक्टर इंजीनियर या ऑफिसर बनके दिखाऊँगी,
अपने परिवार के सम्मान को आगे बढाऊँगी माँ।
अपनी ममता की छाव् का सुख मुझको भी पाने दो,
तेरे प्यार की शीतलता में मुझको भी आने दो माँ।
मुझे गर्भ में ही मत मारो, मुझे इस संसार में आने दो माँ।"

By: Dr Swati Gupta



Dedicated to
To society

Dedication Summary
I composed this poem against the Female Foeticide in India...

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1 More responses

  • विनोद सिन्हा-
    Commented on 26-December-2015

    बेटी तेरे कितने रूप,जीवन की छावं कहूं तुझे या अभिलाषा की धूप,बेटी से ही आरंभ ये ज़िन्दगी और होती बेटी पे ही खत्म फिर भी न जाने बेटियों के महत्व को क्यों नही समझ पाते हम..बहुत सुंदर रचना मैडम-"स्वाति".

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