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मम्मी पापा और बचपन

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23 -Jun-2017 Kamlesh Sanjida Childhood Poems 0 Comments  2,645 Views
मम्मी पापा और बचपन

काश मुझे ये बचपन ,
फिर से मिल जायें
और जीवन का ,
ये मतलब समझ में आ जायें ।

अपने पराये से,
चलो कुछ दूर हो जायें
और बचपन में जाकर,
कुछ तो कर जायें ।

वो तुतली-२ बातें,
और फिर खो जायें
और आँख बंद हों,
और सपनों में खो जायें ।

वो माँ की गोदी ,
पापा संग सो जायें
और अपनीं ही अपनीं जिद पे ,
उनसे फिर अड़ जायें ।

खुद की थाली से माँ,
रोटी बचाकर मुझे खिला जायें
और भूखे पेट ही,
पानीं पीकर सो जायें ।

वो फटी हुई बनियान ,
और पापा जूते सिलवायें
चलो एक महीना और,
हमको खिलोने दिलवायें ।

काली चाय ही पीकर ,
पापा हर रोज चले जायें
पर बच्चों के लिये वो,
एक कप दूध बचा जायें ।

कैसी ग़ुरबत में,
हमने अपने दिन हैं कटवाये
पर उसी प्यार को आँसूं,
आज फिर आँख में आ जायें ।

पर आज उन्हीं दिनों को ,
हम हर रोज ही ढुँढ़वायें
और पापा की वो बातें ,
सोच -२ ही रो जायें ।

वक़्त के पन्नों में,
न जाने कहाँ खो जायें
और फिर भी हम जिन्दा हैं,
और जिए जायें ।




कमलेश संजीदा

kavikamleshsanjida@gmail.com

Mobile No. 9410649777



Dedicated to
Dedicated to My Papa Late shri Ram Hans

Dedication Summary
Because when I was writing this poem my eyes were full of tears and happens with me whatever things described in poem

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