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नदी की पीड़ा।

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03 -Oct-2019 Anil Mishra Prahari River Poems 0 Comments  200 Views
Anil Mishra Prahari

नदी की पीड़ा।

दूषित होकर बहता नदियों का सारा जल।

धरती के कण-कण को सींचा
ऊसर, समतल या तल नीचा,
तृषित जगत् का कण्ठ भिगोकर
किरणों से जल लिया दिवाकर,
तट शोभित होते शहरों से
अमित प्यार जग का लहरों से।
अब निर्मल जल को मैला करता जग प्रतिपल
दूषित होकर बहता नदियों का सारा जल।

नर -नद का अब तार भंग है
गंध बहुत बह रहा संग है,
धारा में विष घुलता जाता
मौन मनुज है, मौन विधाता,
फेनिल धारा, क्षारयुक्त भी
मीन , जलज से हुई मुक्त भी।
नदियों में ही डाल रहा मानव अपना मल
दूषित होकर बहता नदियों का सारा जल।

मत कर कलुषित नद का आँचल
बहने दे धारा को कल- कल,
रोक शहर का गंदा पानी
अबतक की अपनी मनमानी,
नदियाँ तो संस्कृति के उद्गम
लें व्रत इन्हें बचाएंगे हम।
नदियों को पावन रखने का कर ले कुछ हल
दूषित होकर बहता नदियों का सारा जल।

अनिल मिश्र प्रहरी।



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