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Kisan Ki Suraksha

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23 -Apr-2015 Rajendra Bahuguna Natural Disasters Poems 1 Comments  1,027 Views
Rajendra Bahuguna

तुम भाषणो में लीन थे, वो पेड में गमगीन था
तुम वेदना से हीन थे, वह वेदना से दीन था
तुम मंच के सरपंच सब प्रपंच में मदहोश थे
वो सियासी भावना में बह गया ये दोष थे

दृष्टि में घटना तुम्हारे सामने सब हो रही थी
चेतना सब की सियासी मद की हद में सो रही थी
चाहते तो जान बच सकती थी उस नादान की
पर राजनीति में कंहा है आज कीमत जान की

फिर सियासी तंज की सतरंज चालें चल रही है
वेेदना के इन सुरों से भी सियासत पल रही है
मौत के नाटक के फाटक,सब तरफ से खुल रहे हैें
शव, सियासी ,सल्तनत के शौक में ही झुल रहे हैं

वेदना के इस कफन से लाश दबती जा रही है
ये खबर अब पत्र में भी खास छपती जा रही है
इस मौत में भी जाँच के आदेश होते जायेंगे
अन्नदाता सान्त्वना के शब्द फिर से खायेगे

सत्ता सियासत से अलग कुछ लोग उठने चाहिये
दान के अंकुर धरा में फिर से फुटने चाहिये
सामर्थ्यता से कुछ ना कुछ धन जुटाना चाहिये
अब अन्नदाता की सुरक्षा में तो आना चाहिये

धर्म, मजहब ,जातियों सेे आवाज आनी चाहिये
अब और जाने अन्नदाता की ना जानी चाहिये
बूँद - बूँदो से भरे घट से पिपासा बूझती है
आग को तो बस यही अब एक आशा सूझती है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

Kisan Ki Suraksha


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1 More responses

  • poemocean logo
    Vinay Rawat (Guest)
    Commented on 24-April-2015

    Very Nice Rajendera Ji I really like ur poem.

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