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Mera Mann Sochta Hai Ki

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27 -Apr-2015 Madan Saxena Natural Disasters Poems 0 Comments  1,434 Views
Madan Saxena

मेरा मन सोचता है कि

आज जब आया भूकंप
नेपाल में पुरे उत्तर प्रदेश में
अचानक प्राकतिक दुर्घटना घटी
उसी पल जमीन फटी
सजे सम्भरें सुसज्जित गृह खँडहर में बदल गये
शमशान गृह में ही सारे शहर ही बदल गये
मेरा मन सोचता है कि

ये चुपचाप सा लेता हुआ युबा कौन है
क्या सोचता है और क्यों मौन है
ये शायद अपनें बिचारों में खोया है
नहीं नहीं लगता है ,ये सोया है
इसे लगता नौकरी कि तलाश है
अपनी योग्यता का इसे बखूबी एहसास है
सोचता था कि कल सुबह जायेंगें
योग्यता के बल पर उपयुक्त पद पा जायेंगें
पर अचानक जब आया भूकंप
मन कि आशाएं बेमौसम ही जल गयीं
धरती ना जानें क्यों इस तरह फट गयी
मेरा मन सोचता है कि
ये बृद्ध पुरुष किन विचारों में खोया है
आँखें खुली हैं किन्तु लगता है सोया है
इसने सोचा था कि
कल जब अपनी बेटी का ब्याह होगा
बर्षों से संजोया सपना तब पूरा होगा
उसे अपने ही घर से
अपने पति के साथ जाना होगा
अपने बलबूते पर घर को स्वर्ग जैसा बनाना होगा
पर अचानक जब आया भूकंप
मन कि आशाएं बेमौसम ही जल गयीं
धरती ना जानें क्यों इस तरह फट गयी
मेरा मन सोचता है कि
ये बालक तो अब बिलकुल मौन है
इस बच्चे का संरछक न जाने कौन है
लगता है कि
मा ने बेटे को प्यार से बताया है
बेटे को ये एतबार भी दिलाया है
कल जब सुबह होगी
सूरज दिखेगा और अँधेरा मिटेंगा
तब हम बाहर जायेंगें
और तुम्हारे लिए
खूब सारा दूध ले आयेंगें
शायद इसी एहसास में
दूध मिलने कि आस में
चुपचाप सा मुहँ खोले सोया है
शांत है और अब तलक न रोया है
पर अचानक जब आया भूकंप
मन कि आशाएं बेमौसम ही जल गयीं
धरती ना जानें क्यों इस तरह फट गयी

मेरा मन सोचता है कि
ये नबयौब्ना चुपचाप क्यों सोती है
न मुस्कराती है और न रोती है
सोचा था कि ,कल जब पिया आयेंगें
बहुत दिनों के बाद मिल पायेंगें
जी भर के उनसे बातें करेंगें
प्यार का एहसास साथ साथ करेंगें
पर अचानक जब आया भूकंप
मन कि आशाएं बेमौसम ही जल गयीं
धरती ना जानें क्यों इस तरह फट गयी

मेरा मन सोचता है कि
आखिर क्यों ?
युबक ,बृद्ध पुरुष ,बालक,नबयौबना पर
अचानक ये कौन सा कहर बरपा है
किन्तु इन सब बातों का
किसी पर भी, कुछ नहीं हो रहा असर
बही रेडियो ,टीवी का संगीतमय शोर
घृणा ,लालच स्वार्थ की आजमाइश और जोर
मलबा ,टूटे हुयें घर ,स्त्री पुरुषों की धेर सारी लाशें
बिखरतें हुयें सपनें और सिसकती हुईं आसें
इन सबको देखने और सुनने के बाद
भोगियों को दिए गये बही खोखले बादे
अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये
कार्य करने के इरादे
बही नेताओं के जमघतो का मंजर
आश्बास्नों में छिपा हुआ घातक सा खंजर

मेरा मन सोचता है कि
आखिर ऐसा क्यों हैं कि
क्या इसका कोई निदान नहीं है
आपसी बैमन्सय नफरत स्वार्थपरता को देखकर
एक बार फिर अपनी धरती माँ कापें
इससे पहले ही हम सब
आइए
हम सब आपस में साथ हो
भाईचारे प्यार कि आपस में बात हो
ताकि
युबक ,बृद्ध पुरुष ,बालक,नबयौबना
सभी के सपनें और पुरे अरमान हों
सारी धरती पर फिर से रोशन जहान हो .......


प्रस्तुति :
मदन मोहन सक्सेना



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