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प्रकृति की मेंहदी धोता रहा ll

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27 -Apr-2021 Ankita Singh ( Ankita Lucknowist ) Environment Poems 0 Comments  444 Views
Ankita Singh ( Ankita  Lucknowist )

चाँद तो भोर तक खड़ा था,
तू ही रैन सोता रहा ,
सागर हाथ से फिसल गया,
तू क्षितिज पर रोता रहा l
जब था वक्त हँस के जीने का,
तब तू अपाधापी बोता रहा l
इच्छाओं के अन्नत फेर में,
एक और इच्छा संजोता रहा l
इस भाग दौड़ के जीवन में ,
सब सुकून के पल खोता रहा l

सूरज तो साँझ को ढला था ,
तू दिन चढ़े ही धैर्य खोता रहा l
अपनी रंगीन हथेली कर,
प्रकृति की मेंहदी धोता रहा l
अब यूं न हाहाकर कर ,
प्रकृति का संताप हर,
तू कुछ तो पश्चयाताप कर ,
बो दे वसुधा के अंक में ,
कुछ बीज पीपल ,बरगद के,
कुछ अंश नीम तुलसी दल के,
यह मुफ्त में साँसे देंगे तुझको ,
कुछ जीना आसान हो जाएगा l
आने वाली सदियों को आक्सीजन का दर्द न सताएगा ll

©अंकिता सिंह
लखनऊ उत्तर प्रदेश
anks26.as@gmail.com



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