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प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे

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07 -Apr-2020 Jyoti Ashukrishna Natural Disasters Poems 0 Comments  27 Views
प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे

प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे
उनकी पीर देखकर अपनी कहानी जताऊँ कैसे
नंगे पैर चले जा रहे भूखे बच्चे अकुला रहे
ऐसी व्यथा में अपनी अभिव्यंजना गाऊँ कैसे
पोटली सिर पर, माथे पर पसीना बेबस आँखें खोज रहीं हैं दर अपना
आँखों में नीर भरा है दुख की बदरी हटाऊँ कैसे
प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे
हाड़ माँस के प्राणी वो भी सबकी तरह एक जीवन के स्वामी वो भी
उनके हाथों की लकीरों से ये कठिन पल मिटाऊँ कैसे
एकटक उन्हें ताकती आँखें विवशता भरी हैं मेरी साँसें
निर्जन डगर पर चले जा रहे जीवन की चाह में आगे बढ़े जा रहे
स्वयं को भूल उनके लिए हाथ बढ़ाऊँ कैसे
प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे
ओ ! मानवता के स्वामी, हे ! प्रकृति के रक्षक
खबर तुझे भी है पर विवश नहीं है तू शायद
अपनी गलतियों की क्षमा मांगते हे ! करुणा के सागर
कहीं जीवनदायनी शक्ति बनकर आ जा
तुझ बिन और किसी के आगे शीश नवाऊँ कैसे
प्रेमगीत सुनाऊँ कैसे ।



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