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पृथ्वी सभी प्राणियों का घर

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15 -Apr-2018 DINESH CHANDRA SHARMA Environment Poems 0 Comments  1,985 Views
DINESH CHANDRA SHARMA

पृथ्वी सभी प्राणियों का घर |
माँ के आँचल सा सुखदायक , पृथ्वी सभी प्राणियों का घर |
यही अनूठा पिंड सृष्टि में , हरियाली और जीवन जिसपर ||

ओढ़ के चुनरी वायुमण्डल की , अन्तरिक्ष की रानी लगती |
कवच सरीखी है ये चुनरी , रानी की रक्षा भी करती |
खतरनाक किरणें सूरज की , अवशोषित उनको कर लेती |
पास न आने देती कुछ को , छितराकर वापिस कर देती |
मौसम और जलवायु इससे , बादल आते है घिर घिर कर |
यही अनूठा पिंड........................................................||

नभ में लगती जल के कारण , मूल्यवान कोई नीला पत्थर |
सजे हुए जल स्रोत धरा पर , नदियाँ ताल तलैया सागर |
होता वितरित जल चक्रों से , पानी सारे भूमण्डल पर |
युगों युगों तक रहे सुरक्षित , भूजल बन जाता रिस रिसकर |
रिसता बहता आगे बढ़ता , दूर दूर तक जाता उड़कर |
यही अनूठा पिंड.......................................................||

मिटटी है बहुमूल्य संपदा , करती पारितंत्र संचालित |
पौधों को देती है पोषण , पानी रहता यहाँ सुरक्षित |
अपशिष्टों का क्षरण इसी में , करती है यह ताप संग्रहित |
पैदा होती फसलें जिसमें , उपजाऊ मिटटी है सीमित |
बसते हैं बहुजीव भी इसमें , पोषित होते भोजन पाकर |
यही अनूठा पिंड......................................................||

हैं बहुरूप यहाँ जीवन के , छोटी बड़ी श्रृंखलाएं हैं |
पृथक पृथक जलवायु क्षेत्र में , फ़ैली विविध विविधताएं हैं |
बहुरंगी धरती जीवों से , चहुँ दिसि सुन्दरताएँ हैं |
लघु से लेकर के विस्तृत तक , अति प्राचीन अमरताएँ हैं |
करते हैं समृद्ध धरा को , जलचर थलचर और उभयचर |
यही अनूठा पिंड........................................................||

बदल गयी है जीवन शैली , बिगड़ रहा है आज संतुलन |
लिप्सा बढ़ती जाती जन की , अंधाधुंध प्रकृति का दोहन |
नष्ट हो रहे अवयव सारे , कार्बन गैसों का उत्सर्जन |
साफ़ नहीं जल वायु मिटटी , चहुँ दिसि फैला है प्रदूषण |
छीज रहे संसाधन सारे , जिनसे जीवन चलता भू पर |
यही अनूठा पिंड....................................................||

बढ़ता जाता सागर तल है , हरी भरी धरती डूबेगी |
जल में चलती हो या थल में , जीवन की डोरी टूटेगी |
मुश्किल होगा दाना पानी , भावी पीढी क्या भोगेगी |
उजड़ी हुई धरा पर बैठी , रह रह कर हमको कोसेगी |
पृथ्वी बिन नहीं और ठिकाना , बना बसेरा लें हम जाकर |
यही अनूठा पिण्ड सृष्टि में , हरियाली और जीवन जिसपर ||
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