Latest poems on teachers day, sikshak diwas kavita

सब्जीवाली सुशीला

2
15 -May-2018 Suresh Chandra Sarwahara Woman Poems 0 Comments  251 Views
Suresh Chandra Sarwahara

ठेल रही सब्जी का ठेला
देकर जोर सुशीला,
उसे देखकर हो उठता है
मन मेरा कुछ गीला।
अभी अभी तो हुई विवाहित
मन में सपने पाले,
किन्तु मौत से पति की पड़ते
खाने के भी लाले।
घर वालों ने बात बात पर
अब था उसको छीला।
ठेल रही............।
पीहर ही था एक आसरा
पहुँची उसी ठिकाने,
कब तक बैठी बैठी खाती
अब वह लगी कमाने।
बुरे समय में मात पिता का
पड़ा प्यार था ढीला।
ठेल रही......।
कुछ मासों के बाद हो गई
उसके नन्ही बच्ची,
नहीं अकेली आती विपदा
लगी बात तब सच्ची।
संघर्षों का पथ होता है
सचमुच बड़ा कँटीला।
ठेल रही............।
सुबह-सुबह मंडी में जाकर
वह लाती तरकारी,
हाँक लगाती गली गली फिर
बिके न जब तक सारी।
शाम ढले तक पड़ जाता है
मुँह भी उसका पीला।
ठेल रही.............।
अब तो वह अपनी बच्ची को
साथ-साथ ले जाती,
ठेले पर ही उसे बिठाकर
रहती है दुलराती।
बदरंगे जीवन में बेटी
रंग भरे चटकीला।
ठेल रही..........।
जिन हाथों में रची मेहँदी
आज फूटते छाले,
याद महावर को करते हैं
पाँव बिवाई वाले।
इसको फेर समय का कह लो
या किस्मत की लीला।
ठेल रही...........।
*******
- सुरेश चन्द्र "सर्वहारा"



 Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017