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संस्कृति ही मिट रही है

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25 -Jun-2017 Ramashankar Rai 'Vanphool' Culture Poems 1 Comments  5,515 Views
संस्कृति ही मिट रही है

संस्कृति ही मिट रही है
सभ्यता के गांव में,
अपराध देखो पल रहा है,
न्याय के ही छाँव में,

इस पौध की पत्ती ही नहीं,
जड़ तलक भी सड रही है,
और गंगा की ये नहरें,
कर्मनाशा की तरफ़ ही बढ़ रहीं हैं,

न्याय की आवाज
कानों तक पहुँच पाती नहीं,
पाप के घर रोज़
मनती है दिवाली|

पुण्य भूखों मर रहा है
स्वर्ग
उतरा है धरा पर,
बुद्धिजीवी कह रहा है|

पीड़ितों के आह की आवाज़ भी,
पड़ती न उनके कान में
और पसीना,
आज भी गिरवी बना है,
मुल्क हिन्दोस्तां में,

जुल्म और इन्साफ में
दोस्ती गहरी यहाँ है,
बाग़ के इन मालियों से,
बाग़ को ख़तरा यहाँ है.....



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1 More responses

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    SUNIL NAIR (Guest)
    Commented on 23-September-2021

    Vanphool naam ka ek kavita tha. Aap jante hai kavi kaun hai?
    Kavita kuch is prakar se hai:
    Phool kaanto me khila tha sej par murjha gaya,
    jagmagatha tha usha sa kantako me vah suman,
    sparsh se uske tarangit tha surabhivahi pawan,
    le kapuri pankhudiyon me phull madhuruthu ka sapan,
    phool kanto me khila tha Sej par murjha gaya.

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