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शक ओ शुबहा

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26 -Feb-2018 rebel Hate Poems 0 Comments  791 Views
शक ओ शुबहा

सुराही से संकरे दिलों में पनपते,
नफरत और घृणा के बीज,
बेतरह नफरत,
यूं ही नहीं फूट पडती,
गलतफहमी की मिट्टी,
शक और भ्रम की खाद,
जलन का पानी,
सबकी सांझा पैदावार,
बेचारा बागवान,गिरवी रख कर अपना मान,
बोता है विश्वास,मगर उग आता अपमान,
ये तो ना सोचा ,ना चाहा था,
बागवान पाता है खुद ठगा....नादान,
कितनी गफलतों में जीते रहे,
काश तुम समय से भांप पाते,
जज्बातों की गीली रेत पर गल्तफहमी के निशान.
01/10/17
jyoti negi

शक ओ शुबहा


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