Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

आत्मनिर्भरता 2

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24 -Jun-2020 jagmohan jetha Social Poems 0 Comments  300 Views
आत्मनिर्भरता 2

" *आत्मनिर्भरता 2*" आजकल शादियों में *टॉप 50* का फॉर्मूला गजब ढहा रहा है! तथाकथित अपनों को आत्मचिंतन कर "आत्मनिर्भर" बना रहा है! ना किसी को कोई शिकवा हैं और ना ही कोई शिकायत कर पा रहा है यजमान खुद मेहमान बन आनंद उठा रहा है

विकास हो रहा है

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07 -Jun-2020 Harpreet Ambalvee Social Poems 0 Comments  395 Views
विकास हो रहा है

विकास हो रहा है हर तरफ दंगे फसाद मासूमों की चीखे, हर तरफ हाहाकार, हर कोई अपना रोना रो रहा है, मुख्य सेवक कहते हैं विकास हो रहा है आम जरूरतों की चीजों के दाम महंगाई को छू रहे हैं, सरकार आम जनता पर टैक्स लगा लगा कर उनका

उम्मीदे

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25 -May-2020 Kamlesh Dalavadi Social Poems 0 Comments  49 Views
उम्मीदे

गुजर रही रात तो सुबह होनी है कल सूरज निकलने की उम्मीद जगाई है कही पर तो रस्ते नज़र नहीं आएंगे पर बुलंद हौसला लेके ही सफर कटनी है चन्द धड़ी मायूस करे क्यों तुजे यहाँ? जिंदगी को हर मुस्कुराके तो जिनि है दिल में आग और आँ

बच-बचके चल मेरे यार।

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21 -Feb-2020 Anil Mishra Prahari Social Poems 0 Comments  497 Views
बच-बचके चल मेरे यार।

बच- बचके चल मेरे यार। यहाँ जिसे अपना जताओगे ठोकर भी उसी से खाओगे, मुस्कुराता, मासूम चेहरा छलेगा यह विष-बेल जहर ही फलेगा, बन्द आँखों से मत कर सफर अपना बनाके तुझे देंगे जहर। पैरों के नीचे सुलगता अंगार बच- बचके चल मेरे

आशिकों को संभलना (एक ग़ज़ल)

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02 -Feb-2020 Anand kumar (Manish) Social Poems 2 Comments  507 Views
आशिकों को संभलना (एक ग़ज़ल)

आशिकों को संभलना सिखाते हैं लोग बेसहारों को चलना सिखाते हैं लोग ये कलयुग है यहां किसी को किसी की परवाह नहीं यहां तो अंधों को आईना दिखाते हैं लोग खुद कहां पहुंचेंगे कोई ठिकाना नहीं मगर राहगीरों को रास्ता बताते ह

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