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"स्वभाव का रुप"

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30 -Jun-2022 Ravi Human Being Poems 0 Comments  204 Views
Ravi

मनुष्यों में तो भिन्नता का है प्रबल प्रवाह,
रंग-रुप से आकर-प्रकार तक में है बेपनाह।
इसे संगृहीत करना होगा एक बड़ी फतह,
संकलित हो यह बनेगा एक ग्रंथ की तरह।

इनमें से सिर्फ स्वभाव में ही है अजीब बात,
जो सिमट जाती है तीन प्रकार में सारी बात।
देशी-विदेशी में इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ता,
ऑंकने पर सभी इनमें से एक अपने में पाता।

राहों पर ठोकरों का मिलना तो संभावी है,
चलते-चलते ठोकर खाना भी स्वाभाविक है
जो ठोकर खाकर भी बेफिक्र चलते रहते हैं,
ऐसे लोग जीवन भर ठोकर खाते ही रहते हैं।

हममें से कुछ ऐसे भी राह पर चलते हैं,
जो राह में ठोकर खा कर गिरते भी हैं।
पर उठकर गिरने का कारण समझते हैं,
फिर वो कभी नहीं दुबारा ठोकर खाते हैं।

मनुष्यों में कुछ ऐसे भी स्वभाव के होते हैं,
राह पर नज़रें गड़ाए सावधानी से चलते हैं।
अनुमान कर ठोकर खाने से बच जाते हैं,
ज़ेहन में उसकी तस्वीर लिए चले जाते हैं।

यह सीख हमारे लिए बड़े काम की बात है,
निश्छल मन से इसको परखने की बात है।
सुधार लो अपने को अगर तुम्हारी चाह है,
जीवन में सफलता का यह भी एक सार है।

रचयिता: डॉ. रवि भूषण सिन्हा, रॉंची, झारखंड।



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