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तेरा शुकराना

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09 -Jul-2020 Jyoti Ashukrishna God Poems 0 Comments  299 Views
तेरा शुकराना

थी जिंदगी से कुछ खफा खफा
शिकायतें थीं इससे दफा दफा
अधूरी खवाहिशों में उलझा था मन
नीरसता के लबादे से ढक लिया था तन
दौड़ रही थी इस भीड़ में आने को अव्वल
थक रहा था तन-मन फिर भी न जाने क्यों थी विहवल
बिछड़ गया था खुद से खुद का कारवां
खुशियाँ बहुत थीं आस-पास लेकिन सहेजती रहती थी दर्द जवाँ
थी आरजू प्रसन्नता के आलिंगन की
पर आदत हो गई थी शिकायतों की जकड़न की
इस बोझिल जीवन की साँसों की डोर को तोड़ना चाहती थी
इस लोक को छोड़ खुद को परलोक से जोड़ना चाहती थी
न जाने क्योंऔर कैसे वहां रुक गए मेरे कदम
एक छत के नीचे पर-पीड़ाएं देखकर शांत हो गया मेरा ज्वारित धरातल
कोई आक्सीजन मास्क लगाए एक-एक साँस के लिए लड़ रहा था
कोई घातक बीमारी की असहनीय पीड़ा से कराह रहा था
किसी का एक हाथ से नाता टूट चुका था, कोई व्हील चेयर पर बैठा सुबक रहा था
किसी का घाव सड़ रहा था तो कोई दुनिया देखने की ताकत खो चुका था
अपनों की खातिर अपनों की आँखें थी नम
जवान बेटे की अंतिम साँसों को गिन बूढ़ी माँ बुन रही थी गम
देखा मैंने आसमां की ओर
न जाने तूने मुझे क्या-क्या दिया
फिर भी शिकायतें करती रही तुझसे दफा दफा
अब नहीं हूँ मैं जिंदगी से खफा खफा
तेरी दी हुई नियामत है ये
इसके लिए तेरा शुकराना करती हूँ दफा दफा ।

ज्योति आशुकृषणा



Dedicated to
शैवाल अग्रवाल

Dedication Summary
शैवाल अग्रवाल ही इसकी प्रेरणा हैं ।

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