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टुकड़े जो चंद कागज़ के थे

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12 -Nov-2016 Jyoti Social Issues Poems 0 Comments  727 Views
Jyoti

आजकल जो नोट बंद हुये है उसपर मेरी ये कविता है


टुकड़े जो चंद कागज़ के थे
था उनके होने पर बहुत अभिमान हमें
टुकड़े जो चंद कागज़ के थे


सभी को पता था इस बात का
न खरीदा है कभी वक़्त इसने
फिर भी बड़ा गुमान था
हमे इनके होने का
टुकड़े जो चंद कागज़ के थे


रहे है हमेशा ये जड़ लड़ाई की
भाई - भाई में, दोस्तों में ,प्यार में
फिर भी न जाने क्यूँ
इनके होने से बड़ा सकून मिलता था
टुकड़े जो चंद कागज़ के थे


देखती हूँ आज भी इन्हें बड़ी
हसरत भरी निगाहोँ से
सुनती हूँ इनके किस्से
सबकी ज़ुबान से
टुकड़े जो चंद कागज़ के थे


ना खरीदा है इसने मौत को कभी
फिर भी न जाने क्यूँ
आजतक कोई समझ न पाया है
कीमत इनकी
टुकड़े जो चंद कागज़ के थे



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