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उड़ान

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28 -Apr-2019 Naveen Kumar Human Being Poems 0 Comments  347 Views
उड़ान

माँ मुझे भी पंख लगा दो,
मैं भर सकूँ उड़ान ।
मजहब की सीमा से बाहर,
ढूँढ़ सकूँ ईन्सान ।।

रब ने मानव जाति बनाई,
नाम उसे ईन्सान दिया ।
आपस में हम साथ रहें,
बस मानवता पहचान दिया ।।
मजहब की गलियारों में हम,
भुला चुके अपनी पहचान ।
माँ मुझे भी पंख लगा दो,
मैं भर सकूँ उड़ान ।।

लाचारी गलबाँहें भरती,
आँहें भी खामोश यहाँ ।
अपने ही अपनों को लूटे,
रिश्तों की अब कद्र कहाँ ?
लोगों के परिचय करवाता,
पद, पैसा, परिधान ।
माँ मुझे भी पंख लगा दो,
मैं भर सकूँ उड़ान ।।

जब अपराधों का मूल्यांकन,
हो रहे मजहबी चश्मों से।
ईन्साफ कहाँ मिल पाऐगा,
'कठुआ' जैसे बेशर्मों से ।।
इस घनघोर अँधेरी रातों का,
लाना मुझको है नव विहान ।
माँ मुझे भी पंख लगा दो,
मैं भर सकूँ उड़ान ।।

कितना अच्छा होता मजहब,
एक ईन्सानियत होती।
ना दंगे लव ज़िहाद के होते,
ना घरवापसी होती ।।
गुरूग्रंथ, बाईबल संग पढ़ते,
गीता और कुरान ।
माँ मुझे भी पंख लगा दो,
मैं भर सकूँ उड़ान।।
मजहब की सीमा से बाहर,
ढूँढ़ सकूँ ईन्सान ।।

नवीन कुमार
पुष्प विहार, नई दिल्ली
मोबाईल नं-9582296978



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