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08 -Mar-2017 अभिषेक आर्य Hate Poems 0 Comments  838 Views
अभिषेक आर्य

हर रोज़ मांगता हूँ ख़ुदा से ,
दुआ तेरी मौत की !
सजदे में सर झुकते हीं ,
इस्तक़बाल करता हूँ तेरे ज़नाज़े को !
खूब दौड़ाया आशिक़ी की गाड़ी ,
तेरे चाहत के शहर में !
चलो अब छोड़ आऊं तुम्हे ,
जहन्नुम की पथरीली गलियों में !
ऐ मल्लिका- ए- बदसूरत- ,
तेरी सादगी भाई थी हमें !
पर अब रंग गई है तू ,
बदनामी की महँगी कालिख में !
तेरी दो कौड़ी की औक़ात ,
उस सड़क के नाले सी है !
जिसकी बदबू से बदहाल हैं ,
हम कुछ ग़रीब राहगीर !
छोटा है शहर ये ज़ालिम ,
आँखे टकरा हीं जाती उस मोड़ पे !
जंहा लोग तेरी बदचलनी के किस्से ,
चाय की चुस्कियों के साथ करते हैं !
नुक्कड़ की वो सौंधी सी चाय ,
पहुँच गई है महँगी होटलो में !
जंहा ललचाई नज़रो से
घूरते कुछ इज्जतदार लोग !
सुनी है तेरी तारीफे ,
उन अभागे आशिक़ो से !
जिन्हें गिराया तूने ,
उनकी किस्मत की ऊंचाइयों से !
बंद करो शाम - ए - महफ़िल ,
गूंज रही है तेरी घुँघरू की खनक !
वो लौट न सके तेरे चंगूल से ,
जो कभी रूठे थे अपनो से !
थोड़ी सी अभी है तू मुझमे ,
या दोस्तों की शैतानियों में !
जंहा शौक से बेआबरू होती तू ,
जिस्मफरोसी के दलालो से !
चली जा इस मन के संसार से ,
जंहा मासूका बन बैठी हैं !
बड़े होने का गुरुर और ,
मेरी बिकी हुई अहंकार

-अभिषेक आर्या



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