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उर्दू को मुसलमाँ समझते हो।

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07 -Dec-2021 ताज मोहम्मद Sad Poems 0 Comments  23 Views
ताज मोहम्मद

यही तो दिक्कत है तुम्हारी तुम उर्दू को मुसलमाँ समझते हो।
पैदाइश है ये हिन्दुस्ताँ की तुम इसे गैरो की जुबाँ समझते हो।।1।।

ये कौन सा बाजार है जहाँ इंसानो की तिजारत होती है।
बोली लगती है आबरु की तुम आबरु को सामाँ समझते हो।।2।।

कहाँ ढूढते हो तुम खुदा को इधर से उधर मस्जिद-ओ-मंदिर।
घर में ही है अक्स उसका जिसे तुम अपनी माँ समझते हो।।3।।

नसीहते सदा काम आती हैं ज़िन्दगी में बुजुर्गों की हमारें।
तुम इन नसीहतों को क्यों ऐसे फर्जी का बयाँ समझते हो।।4।।

सुमार होता था उसका एक वक़्त शहर की आला हस्तियों में।
वो है उस कोठी का मालिक जिसे तुम दरबान समझते हो।।5।।

नाकाबिले गौर है तुम्हारा इस तरह से ज़िन्दगी का जीना।
यह घर है तुम्हारा जिसे तुम मुर्दों का कब्रिस्तान समझते हो।।6।।


हर चहरा है यहाँ अपनों का वह किसको कहें कातिल।
वह है बड़ा ही शातिर जिसको तुम नादानें जान समझते हो।।7।।

ताज मोहम्मद
लखनऊ



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