Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

वो बेटा किस काम का .....

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Wo Beta Kis Kaam Ka : This is very touching hindi poem that convey a message to serve and respect our old parents. This poem tells that the family controversy for parent's property is very bad thing and the sons who are doing this are very sinful. The brothers who fight and kill each other for parent's property and lands are ruining a healthy family relationship. The son who do not serve and respect their parents and who send their old parents to old age home are useless and irresponsible. They should shame on themself for these acts. We should understand that parents are our God. We should try to keep them happy.

24 -Dec-2017 Piyush Raj Family Poems 1 Comments  886 Views
Piyush Raj

वो बेटा किस काम का ........

एक हाथ जमीन के खातिर
बहा रहे भाई, भाई का खून
ये धन-दौलत पाने का
न जाने कैसा है ये जुनून

माँ-बाप की दौलत पर
जो जताता है अधिकार
ऐसे बेटों पर तो है
सभी को धिक्कार

मीठे बोल जो न बोल सके
वो बेटा है सिर्फ नाम का
दो वक्त की रोटी जो
न दे सके अपने माँ-बाप को
वो बेटा ही किस काम का

जिसके लिए माँ ने सहे है
न जाने कितने दुख
आज वो बेटा नही दे रहा
अपनी माँ को कोई सुख
जब बुखार से तड़पता था बेटा
माँ रात भर नही सोती थी
थोड़ा सा भी कष्ट हो उसको
माँ पल भर में रो देती थी
तुझे पाने के लिए माँ ने
न जाने कितनी मन्नत मांगी
उसने तेरे रूप में
खुदा से जन्नत मांगी
पर माँ को क्या पता था
इस जन्नत में है सिर्फ शूल
अब ऐसा लगता है माँ को
बेटा मांग के कर दी है भूल
अब उनको आता है
अपने बेटे पर ही शर्म
जब से वो छोड़ आया है
बूढ़ी माँ को वृद्धा आश्रम

दुनियावालो के लिए उसने
खूब पैसा उड़ाया
और अपनी माँ को
भूखे पेट तड़पाया

माँ के चरणों मे है स्वर्ग
वो भूल गया ये सच्चाई
ठुकरा दिया उसी माँ को
जो उसे इस दुनिया मे लाई

जो दर्शन न करा सका
माँ बाप को चार धाम का
जो दे ना सका दो वक्त की रोटी
वो बेटा ही किस काम का

© पियुष राज "पारस"
दुमका झारखंड
P76/24-12-17



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1 More responses

  • Rohit kumar Ambasta
    Rohit kumar Ambasta (Registered Member)
    Commented on 12-May-2018

    वाह! आज के समय की वास्तविकता प्रकट करती है ये कविता। बहुत उम्दा.

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