Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

ये शहर

0
22 -Jun-2021 राजेश्वरी पंत जोशी City Poems 0 Comments  79 Views
ये शहर

ये शहर

कितना अजनबी सा ,हो गया है ये शहर.
जैसे किसी को जानता, ही नही है शहर.
मिलने को तो, मिलते है रोज सबसे यहाँ.
किसी को लेकिन, पहचानता नही है शहर.

यूँ तो रात - दिन, चलता रहता है शहर.
रोशनी, हंगामों से, मचलता रहता है शहर.
हँसने के लिए तो हँसते है, सब इस शहर में.
किसी को अपना, लेकिन मानता नही है शहर.

कितनी सड़के है, जाने कितने मोड़ भरे पड़े.
रास्तों को लेकिन, पहचानता नही है शहर.
मिलते तो है गले सब दोस्तों की तरह रोज ही.
दोस्ती को निभाना, पर जानता ही नही है शहर.

कुछ डरा- डरा सा, हैरां- हैरां सा रहता है रोज ही.
रोज चुपचाप सा ,रेंगता सा चलता रहता है शहर.
गले से लगाना, आजकल शायद भूल सा गया है.
बड़े गैरों सा मुझसे, अब ये मिलने लगा है शहर.

भीड़ से अब बहुत, भर सा गया है शहर.
शोर से बहुत दब सा, गया है अब ये शहर.
अब रोज ही हर मोड़ खून से, सन सा रहा है.
ख़ौफ़ से कुछ, भर सा अब ये गया है शहर.

रोने की भी फुरसते, नही मिलती यहाँ.
दौड़ता रहता है, हरदम ये शहर .
रात को चंद ,लम्हों के सन्नाटे में,
थक कर शायद, सो गया है शहर.
राजेश्वरी पंत जोशी ,
उत्तराखंड



 Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017