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युद्धोन्माद

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27 -Mar-2018 Suresh Chandra Sarwahara War Poems 0 Comments  657 Views
Suresh Chandra Sarwahara

वृन्दावन में
अब नहीं रचता
गोपियों संग कृष्ण का
दिव्य - सृष्टि को
आभासित करने वाला रास,
आजकल
खोई - खोई रहती है 'राधा'
बिन कान्हा के
रहने लगा है
उसका मन भी उदास।
अधीर कर देने वाली
कान्हा की
बाँसुरी की टेर
अब न जाने कहाँ
खो गई है ,
आज अकेली राधा
सुधियों में खोई
कदम्ब के तने पर
टिकाकर सिर
ना जाने कब सो गई है।
कल तक लता कुंजों में
उसके साथ
आँख मिचौनी
खेलने वाला कन्हैया
आज यकायक बड़ा होकर
महाभारत रचाने में
हो गया है व्यस्त,
लौट आती हैं खाली हाथ
सूनी पगडंडी पर
दूर दूर तक जाकर
अपने श्याम की
मोहक छवि देखने को आतुर
दो आँखें अभ्यस्त।
राजनैतिक छल - छन्द
छल - कपट
और बढ़ते घृणा के अन्तर्द्वन्द्व
अनुबन्धन की संभावनाओं को
बता गये धता,
टूट गई तान बाँसुरी की
महारास का राग रंग
हो गया भंग
खो बैठे
शांति - वीणा के तार
सात सुरों की 'एकता'।
पीड़ा को
अपने अंदर दबाए
हो गयी है खामोश आज
रह - रहकर
कभी मचलने वाली गोपियों की
प्रेम - पगी ' भावना '।
कौन था कृष्ण उनका ?
अंतरंगता के गात को उघाड़ते
इन चुभते प्रश्नों का
भला वे
करें कब तक सामना !
रंग रेखाएँ भावों की
आपस में घुल मिलकर
कर गई विकृत
मन - आँगन की अल्पना,
छोड़कर
इस अनजाने मोड़ पर
उनको अकेला
चल देंगे सब थामकर
हाथों में पताकाएँ युद्ध की
इसकी तो कभी
की भी न थी 'कल्पना'।
कौन
किसकी ' मैत्री 'पर
अब दम भरे !
युद्ध को जाती
इसी कृष्ण की
चतुरंगिणी सेना ने
रौंद दिये
ब्रज के
मधुबन हरे।
कभी चांदनी के
शीतल जल से नहलाता
चंदा' पूनम 'का
आज नील - व्योम में
भटका - भटका
और धुंधलाया - सा
लगता है।
ऐसा ही होता है
जब किसी
रागमयी राधा के
पैरों में बाँधी
पायल को तोड़
युद्धों में जाता
मनमोहन कोई
ठगता है।
लगता है
हो गया है
डूबे डूबे तारों का भी
अपनी ही रोशनी से अनबना,
पंख टूटे रेंगते जुगनू
जा छुपे तरुगुल्मों में
समझ चुके हैं कि
मिलकर भी
कभी फिर से
वे ला न सकेंगे
खो गई जो 'ज्योत्सना'।
उस कान्हा के
श्यामल तन की याद दिलाती
मन में राधा के
मधुर - मधुर वेदना जगाती
यमुना भी अब
कहाँ रही है ' निर्मला '!
रुधिरमय हो गया है
स्वच्छ नीर,
तैर रहे हैं
रथों के टूटे पहिए
ध्वजा बाहु
और शव किसी का
अधजला।
हो जाता है उन्मत्त
जैसे साधारण जन
' मधु' - रस पीकर,
वैसे ही
उन्माद युद्ध का
चढ़ गया था
हर नृपति के सिर पर।
रुधिर नहाए कुरुक्षेत्र में
अब सड़ती है
गिद्धों कुत्तों से नौंची
वृहद् चिताओं से
ढह - ढह गिरती
युद्दोन्मत्त मानव की लाश,
हठधर्मी मानव की
इस आमंत्रित विपदा को
विषपायी शंकर भी
क्योंकर बाँटेंगे ?
अनदेखा कर
मानव निर्मित इस विभीषिका को
वे बने मौन
जा बैठे 'कैलाश'।
चिताओं से उठता धुआँ
विधवाओं अनाथ बच्चों का
हृदय - भेदी करुणाक्रन्दन,
सहम - सहम कर
धरती पर पग धरती
' उषाकिरण 'का
अब करते हैं वन्दन।
हो गए
आँचल 'ममता ' के तार - तार
कितने ही
वृद्धों लाचारों की
लाठी टूटी है,
रुक गया विकास का
चलता पहिया
सभ्यता संस्कृति की
इन युद्धों में
किस्मत ही फूटी है।
हारे तो मारे
लेकिन
जीते भी हारे हैं,
मानवता के लिए
अभिशाप हैं युद्ध
और विनाश के
खांडे दोधारे हैं।
*****
- सुरेश चन्द्र "सर्वहारा"



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