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युवा पलायन - Youth Migration

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14 -Aug-2019 Vikash Varnval Youngster Poems 0 Comments  526 Views
युवा पलायन - Youth Migration

युवा पलायन

खुद के ही आशियाने में मेहमान बन के जाता हूं
अव्वल बनने की होड़ में परदेसी गीत गाता हूं
बटुवे में माँ की तस्वीर निहार अश्कों से नहाता हूं
खुद ही रोटी पकाता और अकेले बैठ के ख़ाता हूं

कहते हैं मेरे जहीर ईद का चाँद हो गया हूं
साल लग जाते हैं आने में गाँव इफ्तार हो गया हूं
माँगता हूं रब से खुशियां माँ बाप की ईदी में
उनकी खिदमत नहीं कर पाता शर्मसार हो रहा हूं

गाँव में है आशियाना, परदेस तो पिंजरे सा लगता है
ऐशो आराम तो है फिर भी क्ल्ब आशियाने को भगता है
रोज़ी रोटी के चक्कर में ज़िंदगी अब खाना बदोश है
इक़बाले ख्वाहिश क़ौम को, अच्छे बुरे का किसको होश है

वो शाम का समय, द्वार पे चारपाई लगाना
हाथ में गुड़ वाली चाय, आसमान में चिड़ियो का चहचहाना
वो मंदिर की घंटी, वो कान्हा का भजन गुनगुनाना
बहुत याद आता है लालटेन के चारो तरफ बैठ के खाना

यहां लोग दर्द और तकलीफ़ केवल डॉक्टर को सुनाते हैं
डिप्रेशन के शिकार हैं सब, नाम के रिश्ते नाते हैं

भीड़, पोल्यूशन, धक्का मुक्की और गहमा गहमी है
बनावटी मुस्कुराहट तो है पर सबकी आँखों में नमी है

शिक्षा, स्वास्थ, रोज़गार की माँग कर रहे गाँव
इनके बिना युवाओं की मझधार में है नाव
पँचवर्षी योजनाओं पर अब होनी चाहिए जाँच
नेता और अधिकारी फिर करेंगे नागिन नाच

छुट्टी की अर्ज़ी लगा दी है अब टिकेट भी कटा लूँगा
बड़ी बेचैनी है, माँ मिल जाए तो गले से लगा लूँगा
पापा के लिए घड़ी माँ के लिए नया शाॅल ला रहा हूं मैं
बिछड़ के हुआ है बुरा हाल, की अब घर आ रहा हूं मैं

विकास वरनवाल



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